International Journal of Academic Research and Development

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Vol. 2, Issue 2 (2017)

रामायण में दान की महिमा


डाॅ0 अशोक कुमार दुबे

भारत की प्राचीन धार्मिक मान्यताओं मंे दान का अत्यन्त महत्त्व रहा है। धार्मिक ग्रन्थों मंे व्यक्ति के लिए सामथ्र्यानुसार दान देने की बात कहीं गयी है। ऋग्वेद् में कहा गया है-जो न तो धर्मात्मा व्यक्तियों को देता है, न मित्र को देता है, वह केवल अकेला भोजन करने वाला केवल पाप को ही खाता है। ऐेसा मूर्ख व्यर्थ ही अन्न प्राप्त करता हैै। सच कहता है कि वह अन्न नहीं, वह तो उसकी मृत्यु है।1 तैत्तिरीय उपनिषद् में भी श्रद्धापूर्वक दान देने पर बल दिया गया है-“श्रद्धा से देना चाहिए, अश्रद्धा से नहीं देना चाहिए, आर्थिक सामथ्र्यानुसार देना चाहिए, लज्जा से देना चाहिए, भय से देना चाहिए और पात्र-अपात्र का विवेक करके देना चाहिए।”2 भगवान श्री कृष्ण ने गीता में सात्विक, राजसिक3 एवं तामसिक4 तीन प्रकार के दानों का प्रतिपादन किया है। दान देना ही चाहिए-ऐसा मानकर जो दान प्रत्युपकार न करने वाले सुपात्र को उचित स्थल ओर उचित समय में दिया जाता है वही दान सात्विक कहलाता है।5 महाकवि अश्वघोष ने लिखा है कि दान अमरत्व का कारण है, सुख का क्षेत्र है, हर्ष की निधि है और चित्त के निग्रह का कारण है।6 इस प्रकार अनेक ग्रन्थों में दान की महत्ता एवं अनिवार्यता का प्रतिपादन किया गया है। महर्षि वाल्मीकिकृत रामायण का मूलाधार ही धार्मिक मान्यताओं की स्थापना करना था। अतः दान की महिमा उन्होेंने भी मुक्त स्वर से गायी है। यज्ञ के अवसर पर वसिष्ठ मुनि दान की पवित्रता की ओर संकेत करते हुए कहते हैं- हे भद्रपुरुषों! किसी को कुछ देना हो उसे अवहेलना के साथ नहीं देना चाहिए क्योंकि अनादर पूर्वक किया गया दान दाता को नष्ट कर देता है। इसमें कोई संशय नहीं है।7
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