International Journal of Academic Research and Development

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International Journal of Academic Research and Development
Vol. 1, Issue 4 (2016)

चन्द्रकुमार अगरवाला की काव्य चेतना का अनुशीलन (असमीया रोमांटिक साहित्य के विशेष सन्दर्भ में)


जयन्त कुमार बोरो

असमीया साहित्य में रोमामंटिक युग का प्रारम्भ सन् 1889 में प्रकाशित ‘जोनकी’ 1 पत्रिका के साधारणतः माना जाता है। रोमान्टिक युग या ‘रोमान्टिस्जिम’ 2 को असमीया साहित्य में एक साहित्यिक आन्दोलन के रुप में देखा गया । असम में इस युग को नवजागरण की संज्ञा के अभिहित किया गया । इस आन्दोलन का श्रीगणेश ‘असमीया भाषा उन्नति साधिनी सभा’ से होता है । उन्नीसवीं शताब्दी के अस्सी के दशक में कलकत्ता में अध्ययनरत असमीया छात्रों ने इस सभा को जन्म दिया । प्रारम्भ में यह सभा उन छात्रों के मेल मिलाप करने के लिए प्रति शनिवार को आयोजित होने वाली एक साधारण सभा थी । कलकत्ता में आये हुये असम के सभी विद्यार्थी एक साथ सम्मिलित होकर मेल-मिलाप करते थे । 25 अगस्त, सन् 1888 में कलकत्ता में शहर के मध्य ‘अ. भा. उ. सा. स.’ के नाम से एक विख्यात युगान्तकारी सभा का निर्माण किया । सभा के कम से कम बीस छात्रों के एक दल ने असमीया साहित्य में नवजागरण का चादर फैलाया । चन्द्रकुमार अगरवाला, हेमचन्द्र गोस्वामी और लक्ष्मीनाथ बेजबरुवा इस दल के तीन प्रधान छात्र थे । इन तीनों छात्रों के अथक प्रयसों से ही सन् 1889 के जनवरी महीने में ‘जोनाकी’ नामक असमीया पत्रिका का प्रकाशन हुआ । चन्द्रकुमार अरगवाला ने असमीया में अंग्रेजी रोमान्टिक भावधारा को प्रवाहित कर असमीया साहित्य में नवीन चेतना को विकसित किया । जिसका परिणाम उसके समकालीन और परवर्ती साहित्यकारों तथा कवियों में स्पष्ट रुप से देखने को मिलता है ।
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