International Journal of Academic Research and Development


ISSN: 2455-4197

Vol. 1, Issue 2 (2016)

बोड़ो लोकगीत में प्रकृति चित्रण का अनुशीलन (असम प्रांत के विशेष सन्दर्भ में)

Author(s): जयन्त कुमार बोरो
Abstract: आज पूर्वोत्तर भारत की भाषा एवं बोलियों के लिए नये पूणर्जागरण की आवश्यकता है। पूर्वोत्तर भारत के प्रान्तीय और क्षेत्रिय विशेष की भाषा एवं बोलियों पर संकट के बादल छाया हुआ है। अगर ऐसा ही रहा तो इन को एक दिन मृतभाषा की संज्ञा से अभिहित किया जाएगा। कोई भी भाषा मरती तो नहीं है लेकिन उसका प्रचलन रुक जाता है। अंत में जिसे मृत भाषा की संज्ञा या नाम दे दिया जाता है। पूर्वोत्तर भारत के लोक साहित्य जिनका स्वरुप काफी पौराणिक एवं मनोहारी है, उन सबको मृत साहित्य की संज्ञा ने मिले इस हेतु उन्हें ज्यौं का त्यौं बनाये रखने की आवश्यकता है। प्रत्येक सामज का अपना एक साहित्य एवं भाष है। असम प्रांत का बोड़ो जनजाति असमीया संस्कृति के निर्वाह में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को स्थापित करता है। बोड़ो जनजातियों ने अपने लोकगीत में प्रकृति के विविध उपादानों को अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त किया है। इस समाज की मौखिक साहित्य के रुप में लोकगीत का विशेष महत्व है।
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